Wednesday, November 20, 2019

सर्व धर्म समभाव

दौर ए मसरूफियत में लोगों को
चंद लम्हे ख़रीद लेने दो
कोई ले रामनामी और कोई
चाहे लेना कमीज़ लेने दो
 धर्म और मज़हबी दुकां वाले
 लेना चाहें तमीज़ लेने दो
 फिर भी जाए न जो फितरत तो फिर
 रब को ऐसे मरीज़ लेने दो
' वीर ' अल्फ़ाज़ से जो बिछड़े हैं
  सबको अपने अजीज़ लेने दो
 पाओगे क्या खटास लेकर तुम
 सबको व्यंजन लज़ीज़ लेने दो
          चंद लम्हे ख़रीद लेने दो

पोखरों की डुबकियों की आस वाले ....

पोखरों की डुबकियों की आस वाले
 तेरे खातिर ही समंदर भी बना है
हारने का हार पहने ज़िन्दगी से हारने को
पहल निश्चित यौवनों का बचपना है
सड़क पर बैठा कभी उस गुप्त को भी क्या पता था
चुटकियों में मगध को भी जीतना है
यदि बने दुत्कार मन की शक्ति, तो मानस सरीखे
प्रति घरों में संग स्वरों के गूंजना है
दूसरों के चयन पर ही आश्रित रह जाने वाले
तेरे खातिर ही स्वयंवर भी बना है
      तेरे खातिर ही.........समंदर भी बना है 

Thursday, November 7, 2019

बापू गांधी( कुंडलिया)

   गांधी बापू राष्ट्र के, हित में करते काम
   कहते कौशल सीखिए, करिए मत आराम
   करिए मत आराम स्वदेशी धारण कर लो
   सत्य अहिंसा व्रत लो,कर लो या फिर मर लो
   मस्तक ' वीर ' झुकाय, ज्ञान की आई आंधी
     बापू चरित महान , बने तब बापू गांधी

ऊषा और शीत (कुंडलिया)

ऊषा प्यारी आ गई, नवलाली के संग
देखो कैसे खिल उठे, दिन वालों के अंग
दिन वालों के अंग नई ताकत ज्यों आई
जो सोते है सोने दो ,छेड़ो मत भाई
कह वीरेश समझाय, लगत है जैसे पूसा
रहो रजाई में खिड़की से देखो ऊषा

मां हिन्दी दिवस

 जिसके शब्द शब्द ने अभिव्यक्ति को है आधार दिया
 क्लिष्ठ कल्पनाएं हों ,लेखन क्षमता को साकार किया
 ऐसी सौम्य मातु हिन्दी को बारम्बार प्रणाम है
 मौसी उर्दू को भी जिसने सच्चा वाला प्यार दिया
   
          मैं सबसे छोटा सेवक हूं भावांजलि स्वीकार करो
        'वीर लेखनी' सफल बने उस शक्ति का संचार    करो

चंद्रयान२

नहीं अमंगल  यह, हे मंगलयान विजेता!
पग धरती पर मन से रख दो नीर बह चले
चन्द्र तलक जाने की इच्छा पूरी होगी
पहचानो निज को , क्यों दृग से पीर बह चले?
              संप्रेषण टूटा है तो क्या, अन्वेषण है।
              बिन संघर्षों हर्ष न ऊंचा मिल पाएगा
              संघे शक्ति और वैज्ञानिक युक्ति गुथकर
             करो वापसी विश्वगुरु फिर विश्व कह चले
      पग धरती पर मन से रख दो नीर बह चले
 
        कुछ न खोया,नहीं अमंगल,विश्व विजेता!

     

शायरियां

१-दोस्ती में मजहब का स्थान नहीं होता
ईशू अलग खुदा अलग भगवान नहीं होता
जब महफिल-ए-यारी में बैठते हैं चार लोग
कब शाम गुजर जाती है अनुमान नहीं होता।

२-मेरे अल्फाज-ए-बयाँ होने की रुकावट तुम सही
मगर रुक जाए दास्तान-ए  -लिखावट ?...कभी नहीं

३-ज्यों कुम्हार कच्ची मिट्टी से सुन्दर घडे बनाता है,
शिक्षक वैसे संस्कार से बच्चे बडे बनाता है।

४-चाह(लक्ष्य) की चाह न करने पर सपने टूट जाते हैं
'परवाह' की परवाह न करने पर अपने छूट जाते हैं।

५-ये बोलकर न बोलना अपनों को ग़ैर कर गया
 

अमृत गले के नीचे जैसे ज़हर सा उतर गया 

६ -आजकल दुनिया की मैं बेरूख़ी से रूठा हूं

मुझमें कुछ टूट गया इसलिए मै टूटा हूं

अपनी पाकीज़गी को पेश तो मैं कर ना सका

पूरी दुनिया में सच हूं फिर भी उसका झूठा हूं


     ७-      दूर हूं तुमसे करीब आस किए जाता हूं

           मैं तेरी सोच को लिबास दिए जाता हूं

           करके शिरक़त पुकार लेना नजरबंदो को

           तेरे पास ही हूं मैं  विश्वास से बतलाता हूं

८-ज़िन्दगी की दौड़ में निराश नहीं होइए
ख़ुद हाशिए बनाइए न हिम्मत को खोइए
ये ज़िन्दगी गर है तो गम ओ खुशी की लहर भी
न खाली मगज़ सोइए न खुराफात बोइए

९-जीवन की उलझी डोरी हो,
रेखा भविष्य की कोरी हो
डगमग विश्वास लगे मन का ,
इच्छाओं का विलसित तन हो
                      तब मात पिता की आशा को
                      अविचल गति से फलते जाना
                           बाधाएं आएं आने दो  , 
                         कर एक लक्ष्य चलते जाना

१०-प्रभु करो ऐसी कृपा
तप्त सूरज की किरण में  जन में बनकर छांह आऊँ
सब तुम्हारे चरण आये , मैं तुम्हारी बांह आऊं

११-दस्तक देते हाथ थके तेरे दिल के दरवाज़े पर
चार लोग की भीड़ बनी है अंकुश गाजे बाजे पर
बस तुझको मुझपर लगवाई सारी शर्तें दिखती है
तेरे मन से मेरी चाहत जैसे मरते दिखती है

१२-अंतस को मधुरा सोम सींच कर प्राणों के संग घुल मिल जाए
धूम्र सदृश तेरी यादों का पान करूं जो हृदय जलाए
जीवन  के इस महासमर में ले गाण्डीव उतरना होगा
स्मृति चक्रव्यूह टूटेगा , मुझको पुनः निखरना होगा

१३-ये हुस्न ये मासूमियत,इतना प्यार और बेरूखियत
क्या क्या कहूं , दवा भी तुम, दुआ भी तुम, सज़ा भी तुम

दीवाली

मन की कड़वाहट मिटाओ रूढ़ हिय को मधु बनाओ
देहरी पर ज्योति रखकर तम निशा की झट मिटाओ
फलन पद का राष्ट्रहित में कर दो अर्पण, मुस्कुराओ
 एक दीवा मैं जलाऊं एक दीवा तुम जलाओ

Sunday, October 6, 2019

शायरियां

१-अश्क पन्नों पे बिखर के  यूं टूट जाया करते हैं
 जब भी उम्मीद  करूं, अपने तब पराया करते हैं
ख़ास ईजात किए हैं सभी ने अपने कुछ नियम
मनाने के एवज में ख़ुद ही रूठ जाया करते हैं

२-सियासत के नए पौधे उगे हैं आज फिर समझे
विनय अनुनय के झूठे चोंचले हैं आज फिर समझे
हैं समझे हम उन्हें भी जो अभी हमको नहीं समझे
समझदारी में क्या रखा हमेशा हम ही क्यों समझें
   
३-यूं बदलते हैं मंज़र , लगा ही नहीं
साथ मिलते है खंज़र , लगा ही नहीं
शुक्र है रब का कि , मैं अकेला ही हूं
ग़र न दे जो दगा , वो सगा ही नहीं

४-जो थे विश्वास,गिरकर चले ही गए
व्यर्थ दोषों के उबटन मले ही गए
छल न पाया कोई जिनको इतिहास में
वे भी अपनों के द्वारा छले ही गए

५-खुद सज्जन बनने के खातिर औरों को दुर्जन कह डाला
ऐसा भी क्या कपट हितैषी को झट से  बैरन कह डाला
मैंने उन्नति राह दिखाई थी तुमको, मैं अपराधी हूं
तुमने निःस्वारथ को मेरी, मेरा ही मतलब कह डाला
    
६-छोटा भी ओहदा हो,पाकर लोग बदल जाते देखा है
अभिमानी कड़ियों में कसकर सोंच बदल जाते देखा है
कुछ व्यावहारिक परिवर्तन और कोमलता से कटुता का पथ 
अपनों की बातें सहने का भाव बदल जाते देखा है

७-रचता जो इतिहास हारकर वो बैठा है
अपना ही विश्वास हारकर वो बैठा है
अपने कृत्यों में अव्वल है पर किस्मत की
गलती से सरकार हारकर वो बैठा है

८-अटल मुख से कहा था जो अटल ने वो अटल निकला
न था जनसंघ कल तक संग,संग संग आज चल निकला
जो मन की टीस निकली थी कवि की द्रवित वाणी से
  पुरा पाषाण सा वो तीन सौ सत्तर पिघल निकला

९-रीति बंधों  ने रक्त संबंधों को तोड़ दिया
रंगीं एक शाम ने निज बचपनों को छोड़ दिया
एक उसके लिए बेटी घरौंदे छोड़ गई
और वो था कि उसके परिजनों को छोड़ दिया

१०-कभी मैं आशियाने तार तार देखता हूं
अहल-ए- दिल पे कटार मार मार देखता हूं
नहीं परवाह मुझे होगा कैसा मुस्तक़बिल
भरी महफिल में तुझे बार बार देखता हूं

    

Saturday, August 10, 2019

शिव भक्ति में

हे आदिदेव भोले शंकर बलिहारी तेरी भक्ति में

तू गुणागार तू शक्ति सार ,तू परिपालक तू ही संहार
तू तीक्ष्ण नयन तू विषराेधी ,अतिशय भोला असीम क्रोधी
तू त्रिदृग काल गंगा है भाल, तेरा अम्बर है व्याघ्र छाल
त्रिविध तापहर तू विशाल ,ग्रीवा प्रदेश अति विकट व्याल
मृत शय्या से हो खड़ा जीव जिस नीलकंठ की शक्ति में

 हे आदिदेव !हे गंगाधर! ,बलिहारी तेरी भक्ति में

हे चंद्रभाल तू प्रलयंकर, शिव मोक्षमार्ग शिव आरतिहर
हे चंडीपति त्रैलोक्यस्वामि, है झंकृत तुझसे अवनि शिखर
दैदीप्यरूप तू भूतभूप ,शुभ धौलवर्ण नटराज अमर
आमरण अजन्मा लटधारी, सुखकारी रुद्रा त्रिपुरारी
व्याख्यान असंभव तेरा है सब वेदों की अभिव्यक्ति में

हे विषपायी ,सतीश ,शेखर! बलिहारी तेरी भक्ति में
        बलिहारी तेरी भक्ति में
   

Sunday, August 4, 2019

मित्र मंडली

मित्र मंडली वह जो मन की सूखी नद मे नाव चला दे
और वह जो कि अंधकार के पथ में सविता को दिखला दे
' शिवम् ' वही जो सखा व्याधि में जुटकर बाधा रोक सके और
है ' उज्ज्वल ' जो मित्रों की कुटिया में उजियारा फैला दे
हृदय जीत ले ' अजय ' ,प्रेम का स्वाद बढ़ा दे वो ' अभिव्यंजित '
हो ' रितेश ' सा चंट,' दयाशंकर ' के जैसा प्रथम मित्र हो
और ' सुधाकर ' जो निज कर कमलों से मीठी सुधा पिला दे
मित्र मंडली वह जो मन की सूखी नद में नाव चला दे
' बहन ' सरीखी मित्र भाव को समझे और जीवन सुलझा दे
और ' पिता ' से मित्र त्याग करके जीवन जीना सिखला दे
   मित्र मंडली वह ...जो मन की सूखी नद में नाव चला दे
       

Saturday, August 3, 2019

वीर जवान

उड़ जा रे बंदे तुझे ,देश बुलाता है
     उड़ जा रे बंदे
घर सूना सूना है तो क्या , मांग न होने पाए
एक प्राण से लड़ के यदि तू सौ सौ जान बचाए
हे! भारत के कंधे! तुझे, देश बुलाता है
       उड़ जा रेे बंदे

भारत रक्षा शंखनाद जब जगती पर गुंजाए
वसुधा सीमा पर गुर्राए दुश्मन जब भी आए
भारत जन वर दें! तुझे देश बुलाता है
       उड़ जा रे बंदे
तू जब कवच बने धरती मां जुग जुग जीती जाए
धरती पर बोझों की उम्रें तुझको ही लग जाए
खुशियों से भर दे! तुझे देश बुलाता है
        उड़ जा रे बंदे

Wednesday, July 24, 2019

नमन " आजाद "

पुण्य धरा का तृण तृण अपने स्वेद रुधिर से सींचा जिसने
अंग्रेजों की विघटनकारी खाल अस्थि से खींचा जिसने
अनुनय विनय छोड़कर पौरुष से जगती आबाद किया
वीर सपूतों की सूची में नाम अमर ' आजाद ' किया

आस

तुम मिले तो क्या मिले मिले नहीं जो तब तलक
छोड़ जब चले पलट थी धार संग बही पलक
आंख देखी आस थी कि लड़ पड़ेगी आंख से
आंख जब नहीं लड़ी तो देखने लगी फ़लक

स्वागत मेघ

दिशाओं की गर्जना और प्रकृति की मेघ रूपी सर्जना ..
ताल से ताल मिला लो ,शुष्क को ताल बना दो
सावन का बहाना भी है अपनी उत्कंठाओं को हिलोरो, और अपने शारीरिक सौष्ठव को पिपासु और मनमोहकता के मतवालों की मुस्कान के लिए बरसने पर लुटा दो।
अभिवादन है तुम्हारा हरियाली की आकांक्षाओं की ओर से....

Monday, May 27, 2019

कलाम को सलाम

हे धरतीपुत्र कलाम,है तुझको मेरा सलाम
जबतक चलती थी सांस कभी न तूने लिया विराम
है तुझको मेरा सलाम

    विछिन्न हुए हृदयों में तुम स्फूर्ति मार्ग जगाते थे
    गिरकर उठना उठकर चलना बस ये ही तो सिखलाते थे
    विज्ञान विभूति बन जाने का था तेरा पैग़ाम
    है तुझको मेरा सलाम......
 
    थे सम्मानी परहितकारी भारत के लिए समर्पित थे
    जितने भी आविष्कार किए सब भारत को ही अर्पित थे
    थी यही आस कि युवा करें स्वर्णिम अपना भी नाम
    है तुझको मेरा सलाम........

    कर्तव्यनिष्ठता की परिपाटी तुमने और बढाई थी
    सपनों के भारत को लाने में तुमने जान लगाई थी
    विद्वानों की संगति में ही बीती सुबह और शाम
हे धरतीपुत्र कलाम, है तुझको मेरा सलाम
         है तुझको मेरा सलाम।

स्कूल बनाने को

कांटों को फूल बनाने को,प्रतिभा अनुकूल बनाने को
अव्यस्त अनियमित परिवेशों को जड़ सा मूल बनाने को
सौंधी सी मिट्टी को अपने माथे की धूल बनाने को
निकला हूं नवनिर्मित संस्कारों का स्कूल बनाने को

   व्यवहारपरकता और शिक्षा से इनका टूटा नाता है
   ज्यों कुम्हार कच्ची मिट्टी से सुंदर घड़े पकाता है
   शिक्षक वैसे संस्कार से बच्चे बड़े बनाता है
   अज्ञान अशिक्षा और गरीबी को बस भूल बनाने को
   निकला हूं नवनिर्मित ......................................

   द्वेष ईर्ष्या अभद्रता के बच्चे सभी विनाशक हों
   संस्कृतियों का सम्मान करें विद्या के बड़े उपासक हों
   पाश्चात्य सभ्यताओं के ऊपर भारतवासी शासक हों
   भयभीत नौनिहालों को अब नित नव शार्दूल बनाने को
    निकला हूं नवनिर्मित......................................

    जाति पंथ और भेदभाव का विष न इन्हें छूने पाए
    अल्लाह ईशु और रामचंद्र न आपस में लड़ने पाएं
    राष्ट्रधर्म देशानुराग का पाठ सभी पढ़ने आएं
    सब पंथों का आदर हो और झगड़े निर्मूल बनाने को
    निकला हूं नवनिर्मित संस्कारों का स्कूल बनाने को।

Thursday, May 9, 2019

भगिनी तुम प्राणों से प्यारी

भगिनी तुम प्राणों से प्यारी
हिय की व्यथा न कह पाता हूं
सूने घर में रह जाता हूं
कलम डोलती उद्वेलन की
मधुर क्षणों को जब लाता हूं
तिमिर कणों को रोशन करती,माता की अनुपूरक बनती
नेह,समर्पण परिचर्चा से हर्षित होती कुटिया न्यारी
                                 भगिनी तुम प्राणों से प्यारी
               बात सुनाते संग संग खाते
               भोजनगृह में संग संग गाते
               गीतों का विश्लेषण करते
               अपनी जगबीती बतलाते
                दिन ज्यादा थे और बातें कम
                 कौन सुने अब व्यथा हमारी
  भगिनी तुम प्राणों से प्यारी

Sunday, April 21, 2019

मंज़िल की चाहत में

मंजिल की चाहत में अक्सर वर्तमान छोटा पड़ जाता
कोई जीवन को रच जाता, कोई सीमाएं गढ़ जाता
कोई मन के भाव दबाता कोई रस और चाव दबाता
और जवानी को रचने में वह बचपन बूढ़ा कर जाता
       सुनो कर्म से मंजिल छू लो
       मगर जिंदगी को मत भूलो
       पथ से मत भटको निश्चय पर
       बचपन के झूले भी झूलो

लक्ष्य

जीवन की उलझी डोरी हो,
रेखा भविष्य की कोरी हो
डगमग विश्वास लगे मन का ,
इच्छाओं का विलसित तन हो
                      तब मात पिता की आशा को
                      अविचल गति से फलते जाना
                           बाधाएं आएं आने दो  ,
                         कर एक लक्ष्य चलते जाना

मित्र

जीवन की परिभाषा निश्छल
मित्रभाव में अतिशय कोमल
विपत्तियों में मेरे संबल
जन्मदिवस सुखमय हो उज्जवल
                सुख दुःख की बगिया के पाती
                तुम युग युग के सच्चे साथी
                सभी भाव को बड़े चाव से
                मंथन करते झिझक न आती
इन यादों का आज पिटारा रच जाएगा यारों का कल
            जन्मदिवस सुखमय हो उज्जवल❤️

समाधान

किन आखों से रोएं इनका मोल कौन करेगा
खुदगर्ज़ी के हाथों,तिरस्कार के हृदयों से गुहार लगाऊं?
स्वार्थपरक लोगों से जाकर आशा के अंबार लगाऊं?
 जीवन परीक्षक है, निराशों की शुभचिंतक नहीं ,
तो समाधान?
 गुहार ले जाना है विधाता की ओर जाऊं
       झूठ से लड़ जाऊं कपट को नाच नचाऊं
 हरि बिन "वीरेश" को अनमोल कौन करेगा
       किन आखों से रोएं इनका मोल कौन करेगा 

शिकायत

आजकल दुनिया की मैं बेरूख़ी से रूठा हूं

मुझमें कुछ टूट गया इसलिए मै टूटा हूं

अपनी पाकीज़गी को पेश तो मैं कर ना सका

पूरी दुनिया में सच हूं फिर भी उसका झूठा हूं


           दूर हूं तुमसे करीब आस किए जाता हूं

           मैं तेरी सोच को लिबास दिए जाता हूं

           करके शिरक़त पुकार लेना नजरबंदो को

           तेरे पास ही हूं मैं  विश्वास से बतलाता हूं

ज़िन्दगी की दौड़ में

ज़िन्दगी की दौड़ में निराश नहीं होइए
ख़ुद हाशिए बनाइए न हिम्मत को खोइए
ये ज़िन्दगी गर है तो गम ओ खुशी की लहर भी
न खाली मगज़ सोइए न खुराफात बोइए

Sunday, February 10, 2019

सरस्वती वन्दना

हे वीणा धारिणी मां ज्ञान का भंडार भर दो, मेंरे मन में प्रसारित भावना को आज स्वर दो
मेरी कंठा में माता शारदे अधिकार कर दो , मैं गाऊं और मेरी वंदना स्वीकार कर दो
मैं जन की वेदना का बोल बन जाऊं जगत में
तेरी अभ्यर्थना का तोल बन जाऊं जगत में
मैं सेवकचर तेरा अनमोल बन जाऊं जगत में
चराचर सज्जनों को बुद्धि बल वैभव का वर दो
में गाऊं और मेरी वंदना स्वीकार कर दो।
धवल हंसो पे माता,ज्ञानियों में वास तेरा
विटप वन वाटिका फल फूल जड़ और घास तेरा
समूची सी धरा तारोंजड़ित आकाश तेरा
इन्हें पोषित करूं मैं मातु मुझ पर हाथ धर दो
में गाऊं और मेरी वंदना स्वीकार कर दो।
तुम्ही से लेखनी श्रृंगार का सम्मान है मां
कवि शिक्षक,कला,विज्ञान का प्रतिमान है मां
तुम्ही से देव वाणी और नक्षत्री ज्ञान है मां"
वीर" की लेखनी सुनकर के जन के पाप हर दो
में गाऊँ और मेरी वंदना स्वीकार कर दो।
मेरी कंठा में माता शारदे अधिकार कर दो, में गाऊँ और मेरी वंदना स्वीकार कर दो
- वीरेश पाण्डेय"वीर"