Thursday, May 9, 2019

भगिनी तुम प्राणों से प्यारी

भगिनी तुम प्राणों से प्यारी
हिय की व्यथा न कह पाता हूं
सूने घर में रह जाता हूं
कलम डोलती उद्वेलन की
मधुर क्षणों को जब लाता हूं
तिमिर कणों को रोशन करती,माता की अनुपूरक बनती
नेह,समर्पण परिचर्चा से हर्षित होती कुटिया न्यारी
                                 भगिनी तुम प्राणों से प्यारी
               बात सुनाते संग संग खाते
               भोजनगृह में संग संग गाते
               गीतों का विश्लेषण करते
               अपनी जगबीती बतलाते
                दिन ज्यादा थे और बातें कम
                 कौन सुने अब व्यथा हमारी
  भगिनी तुम प्राणों से प्यारी

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