Sunday, April 21, 2019

मंज़िल की चाहत में

मंजिल की चाहत में अक्सर वर्तमान छोटा पड़ जाता
कोई जीवन को रच जाता, कोई सीमाएं गढ़ जाता
कोई मन के भाव दबाता कोई रस और चाव दबाता
और जवानी को रचने में वह बचपन बूढ़ा कर जाता
       सुनो कर्म से मंजिल छू लो
       मगर जिंदगी को मत भूलो
       पथ से मत भटको निश्चय पर
       बचपन के झूले भी झूलो

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