१-दोस्ती में मजहब का स्थान नहीं होता
ईशू अलग खुदा अलग भगवान नहीं होता
जब महफिल-ए-यारी में बैठते हैं चार लोग
कब शाम गुजर जाती है अनुमान नहीं होता।
२-मेरे अल्फाज-ए-बयाँ होने की रुकावट तुम सही
मगर रुक जाए दास्तान-ए -लिखावट ?...कभी नहीं
ईशू अलग खुदा अलग भगवान नहीं होता
जब महफिल-ए-यारी में बैठते हैं चार लोग
कब शाम गुजर जाती है अनुमान नहीं होता।
२-मेरे अल्फाज-ए-बयाँ होने की रुकावट तुम सही
मगर रुक जाए दास्तान-ए -लिखावट ?...कभी नहीं
३-ज्यों कुम्हार कच्ची मिट्टी से सुन्दर घडे बनाता है,
शिक्षक वैसे संस्कार से बच्चे बडे बनाता है।
४-चाह(लक्ष्य) की चाह न करने पर सपने टूट जाते हैं
'परवाह' की परवाह न करने पर अपने छूट जाते हैं।
५-ये बोलकर न बोलना अपनों को ग़ैर कर गया
अमृत गले के नीचे जैसे ज़हर सा उतर गया
६ -आजकल दुनिया की मैं बेरूख़ी से रूठा हूं
मुझमें कुछ टूट गया इसलिए मै टूटा हूं
अपनी पाकीज़गी को पेश तो मैं कर ना सका
पूरी दुनिया में सच हूं फिर भी उसका झूठा हूं
७- दूर हूं तुमसे करीब आस किए जाता हूं
मैं तेरी सोच को लिबास दिए जाता हूं
करके शिरक़त पुकार लेना नजरबंदो को
तेरे पास ही हूं मैं विश्वास से बतलाता हूं
८-ज़िन्दगी की दौड़ में निराश नहीं होइए
ख़ुद हाशिए बनाइए न हिम्मत को खोइए
ये ज़िन्दगी गर है तो गम ओ खुशी की लहर भी
न खाली मगज़ सोइए न खुराफात बोइए
९-जीवन की उलझी डोरी हो,
रेखा भविष्य की कोरी हो
डगमग विश्वास लगे मन का ,
इच्छाओं का विलसित तन हो
तब मात पिता की आशा को
अविचल गति से फलते जाना
बाधाएं आएं आने दो ,
कर एक लक्ष्य चलते जाना
१०-प्रभु करो ऐसी कृपा
तप्त सूरज की किरण में जन में बनकर छांह आऊँ
सब तुम्हारे चरण आये , मैं तुम्हारी बांह आऊं
११-दस्तक देते हाथ थके तेरे दिल के दरवाज़े पर
चार लोग की भीड़ बनी है अंकुश गाजे बाजे पर
बस तुझको मुझपर लगवाई सारी शर्तें दिखती है
तेरे मन से मेरी चाहत जैसे मरते दिखती है
१२-अंतस को मधुरा सोम सींच कर प्राणों के संग घुल मिल जाए
धूम्र सदृश तेरी यादों का पान करूं जो हृदय जलाए
जीवन के इस महासमर में ले गाण्डीव उतरना होगा
स्मृति चक्रव्यूह टूटेगा , मुझको पुनः निखरना होगा
१३-ये हुस्न ये मासूमियत,इतना प्यार और बेरूखियत
क्या क्या कहूं , दवा भी तुम, दुआ भी तुम, सज़ा भी तुम
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