Monday, May 27, 2019

स्कूल बनाने को

कांटों को फूल बनाने को,प्रतिभा अनुकूल बनाने को
अव्यस्त अनियमित परिवेशों को जड़ सा मूल बनाने को
सौंधी सी मिट्टी को अपने माथे की धूल बनाने को
निकला हूं नवनिर्मित संस्कारों का स्कूल बनाने को

   व्यवहारपरकता और शिक्षा से इनका टूटा नाता है
   ज्यों कुम्हार कच्ची मिट्टी से सुंदर घड़े पकाता है
   शिक्षक वैसे संस्कार से बच्चे बड़े बनाता है
   अज्ञान अशिक्षा और गरीबी को बस भूल बनाने को
   निकला हूं नवनिर्मित ......................................

   द्वेष ईर्ष्या अभद्रता के बच्चे सभी विनाशक हों
   संस्कृतियों का सम्मान करें विद्या के बड़े उपासक हों
   पाश्चात्य सभ्यताओं के ऊपर भारतवासी शासक हों
   भयभीत नौनिहालों को अब नित नव शार्दूल बनाने को
    निकला हूं नवनिर्मित......................................

    जाति पंथ और भेदभाव का विष न इन्हें छूने पाए
    अल्लाह ईशु और रामचंद्र न आपस में लड़ने पाएं
    राष्ट्रधर्म देशानुराग का पाठ सभी पढ़ने आएं
    सब पंथों का आदर हो और झगड़े निर्मूल बनाने को
    निकला हूं नवनिर्मित संस्कारों का स्कूल बनाने को।

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