Saturday, September 26, 2020

लघिमा

 संबंधों की लघिमा देखा

अमिट छाप सी छद्म कीर्ति पर

अन बरसे गर्जन वाले उन

मेघों की ध्वनि महिमा देखा

           आदर से अभिसिक्त पटल को

           झेल नहीं पाने को आतुर

           असम्मान को हाथ पसारे

           मुझे बुलाती प्रतिमा देखा

सदा रहा निरूपाय उन्हें संतोष दिलाकर

व्यर्थ भूख को नित्य व्यर्थ ही शांत कराकर

एक बूंद से रीता सा घट भर जाता पर

लगा रहा सौ सौ घट को पानी नहलाकर

    फिर इक दिवस अवनिपतियों की, मान गवांकर,

        असम्मान के हाथों बिकती गरिमा देखा

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