संबंधों की लघिमा देखा
अमिट छाप सी छद्म कीर्ति पर
अन बरसे गर्जन वाले उन
मेघों की ध्वनि महिमा देखा
आदर से अभिसिक्त पटल को
झेल नहीं पाने को आतुर
असम्मान को हाथ पसारे
मुझे बुलाती प्रतिमा देखा
सदा रहा निरूपाय उन्हें संतोष दिलाकर
व्यर्थ भूख को नित्य व्यर्थ ही शांत कराकर
एक बूंद से रीता सा घट भर जाता पर
लगा रहा सौ सौ घट को पानी नहलाकर
फिर इक दिवस अवनिपतियों की, मान गवांकर,
असम्मान के हाथों बिकती गरिमा देखा
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