Friday, October 21, 2022

कलयुगी स्नेह

  चहुदिश असुरक्षाओं में ढालों के संग

जीने की आशा में विष प्यालों के संग 

प्रेम प्रीति की निजता को हरता समाज

विलगित करता अधरों को गालों के संग

     

        शोणित रहित हृदय को रचने में जग को

         दूषित कपट भाव से करता जाता है

                    

                    फिर भी स्नेह भाव की कैसी परिभाषा?

                    अखिल विश्व में मानव गढ़ता जाता है


 अश्रु रेख जब देख कपोलों पर शिशु के

 हृदय धरित्री का करुणा कंपित होता

 साधारण मानुष की तब नीरस चितवन

 देख चित्त असहायों का झंकृत होता

 

        उदासीनता, मिथ्या ढोंगों के बंधन

        में मानव घुट घुट कर मरता जाता है

            

                    फिर भी स्नेह भाव की कैसी परिभाषा?

                    अखिल विश्व में मानव गढ़ता जाता है                  

बेरोजगारी

  और बेबसी और रुहाई

अकर्मण्यता की निठुराई

बल के अनुप्रयोग में बाधा

कड़वाहट से भरी मिठाई

                       मार रहा हूं मन जीने की आशा में

                       कंटक बड़े लिखे सरकारी भाषा में

कदम बढ़ाए चलने वाले

  निश्चय पथ को गढ़ने वाले

हिंदू मुस्लिम वाली सत्ता 

     नहीं देखती पढ़ने वाले

                                   वह हाथों का माल देखती

                                    पैसों का भूचाल देखती

                                   राजनीति के अपराधों में

                                     अव्वल नटवरलाल देखती

   वह माथे की शिकन मिटाती

  और भाग्य की रेखाएं भी

  और मिटाती तप से आई

  भगीरथों की धाराएं भी

    भूखे नंगे और ठिठुरते लोगों की चीखें वैसी हैं

  जिस प्रकार उपयोगी नोटा कानूनी परिभाषा में

             कंटक बड़े लिखे सरकारी भाषा में

Saturday, September 26, 2020

लघिमा

 संबंधों की लघिमा देखा

अमिट छाप सी छद्म कीर्ति पर

अन बरसे गर्जन वाले उन

मेघों की ध्वनि महिमा देखा

           आदर से अभिसिक्त पटल को

           झेल नहीं पाने को आतुर

           असम्मान को हाथ पसारे

           मुझे बुलाती प्रतिमा देखा

सदा रहा निरूपाय उन्हें संतोष दिलाकर

व्यर्थ भूख को नित्य व्यर्थ ही शांत कराकर

एक बूंद से रीता सा घट भर जाता पर

लगा रहा सौ सौ घट को पानी नहलाकर

    फिर इक दिवस अवनिपतियों की, मान गवांकर,

        असम्मान के हाथों बिकती गरिमा देखा

अकेलापन भी अच्छा है

अकेलापन भी अच्छा है


स्वयं की कीर्ति के विश्लेषकों को

कल्पनाकाल के पर्यटकों को

शब्द शक्ति के कुशल चिंतकों को

और सब पाकर कुछ न पा सकने सी

भावना के साथ जीने वाले भिक्षुकों को

अपनी मनोकामना के तीव्र इच्छुकों को


अकेलापन ही अच्छा है

        अकेलापन भी अच्छा है।


अनछुओं को छूने की आस रखने वालों को

शर्तों को तोड़ने की प्यास रखने वालों को

दुर्लभ इच्छाओं का वास रखने वालों को

स्वार्थवश साथी को उदास रखने वालों को


अकेलापन ही अच्छा है।

      अकेलापन भी अच्छा है।

Tuesday, September 15, 2020

सत्ता मद

 अहंकार की आंधी आई

सत्ता पर बरबादी छाई

              सत्कर्मों से पुण्य बटोरे, इतिहासों से निर्णय जोड़े

  निपट लिया प्राचीन घाव से, किन्तु वही अपने स्वभाव से

               फिसल गिरोगे गहरी खाई

 

मद में चूर हुए जो पत्थर ,दर्द हुआ जिनको कटने पर

वही सड़क की शोभा गढ़ते,शिल्पी जिनपर हाथ न धरते

       राजमहल के समय कहीं अब

         सड़क न गह ले ये चतुराई 

     

कितने ही अच्छे मुद्दों से,जनमानस को बहला लोगे

लेकिन प्यासे को पानी से ,अंत समय में भटका दोगे

    जब भी नीयत खोटी होगी , तब प्रतिभाएं छोटी होंगी

       प्रतिभाएं छाएंगी तब जब, हर बच्चे संग रोटी होगी

     उपलब्धियां विफल होंगी यदि

     व्यर्थ गई जन की तरुणाई


अहंकार की आंधी आई ...सत्ता पर बरबादी छाई

नटवर लीला

 घाट घाट राधा संग बाट नापने वाले

तान बांसुरी से रिझाते देखे जाते हैं

पनघट से घट को कंकरी मार अल्हड़ से

ताली दे देके खिलखिलाते देखे जाते हैं

             गवालों की भूख मिटाने खातिर चोरी से

             चोरी चोरी मन को चुराते देखे जाते हैं

            वही मनमोहन करुण दशा देख साथी की

             फूट फूट अश्रु बहाते देखे जाते हैं

माखन चोरी करके झूठ बोलने वाले

सत्य हेतु धर्म सिखाते देखे जाते हैं

नटखट लीलाएं करने वाले मायापति

ब्रह्मज्ञान पाठ पढ़ाते देखे जाते हैं

               देह अभिमान को विराग्ने का ज्ञान देने

               गोपिन का चीर चुराते देखे जाते हैं             

               भक्तों की लाज के बचैया श्री वासुदेव

               अंचल से चीर बढ़ाते देखे जाते हैं

राम

 शौर्य के प्रकर्ष, नीति धारी, चेतना के गीत

विनय के प्रतीक, दशरथ के ललाम हैं

हिय नवनीत,कार्य के पुनीत ,स्वाभिमानी

भेदभाव भेदी जगदीश को प्रणाम है

             जन रक्षा साधने को, वैभव विरागने को

             सब सुख त्यागने को श्रेय तेरो नाम है

             निज मन मारकर ,जन जन तारकर

             जीवन सिखाने वाले मेरे प्रभु राम हैं