चहुदिश असुरक्षाओं में ढालों के संग
जीने की आशा में विष प्यालों के संग
प्रेम प्रीति की निजता को हरता समाज
विलगित करता अधरों को गालों के संग
शोणित रहित हृदय को रचने में जग को
दूषित कपट भाव से करता जाता है
फिर भी स्नेह भाव की कैसी परिभाषा?
अखिल विश्व में मानव गढ़ता जाता है
अश्रु रेख जब देख कपोलों पर शिशु के
हृदय धरित्री का करुणा कंपित होता
साधारण मानुष की तब नीरस चितवन
देख चित्त असहायों का झंकृत होता
उदासीनता, मिथ्या ढोंगों के बंधन
में मानव घुट घुट कर मरता जाता है
फिर भी स्नेह भाव की कैसी परिभाषा?
अखिल विश्व में मानव गढ़ता जाता है