Friday, October 21, 2022

कलयुगी स्नेह

  चहुदिश असुरक्षाओं में ढालों के संग

जीने की आशा में विष प्यालों के संग 

प्रेम प्रीति की निजता को हरता समाज

विलगित करता अधरों को गालों के संग

     

        शोणित रहित हृदय को रचने में जग को

         दूषित कपट भाव से करता जाता है

                    

                    फिर भी स्नेह भाव की कैसी परिभाषा?

                    अखिल विश्व में मानव गढ़ता जाता है


 अश्रु रेख जब देख कपोलों पर शिशु के

 हृदय धरित्री का करुणा कंपित होता

 साधारण मानुष की तब नीरस चितवन

 देख चित्त असहायों का झंकृत होता

 

        उदासीनता, मिथ्या ढोंगों के बंधन

        में मानव घुट घुट कर मरता जाता है

            

                    फिर भी स्नेह भाव की कैसी परिभाषा?

                    अखिल विश्व में मानव गढ़ता जाता है                  

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