Sunday, April 21, 2019

मंज़िल की चाहत में

मंजिल की चाहत में अक्सर वर्तमान छोटा पड़ जाता
कोई जीवन को रच जाता, कोई सीमाएं गढ़ जाता
कोई मन के भाव दबाता कोई रस और चाव दबाता
और जवानी को रचने में वह बचपन बूढ़ा कर जाता
       सुनो कर्म से मंजिल छू लो
       मगर जिंदगी को मत भूलो
       पथ से मत भटको निश्चय पर
       बचपन के झूले भी झूलो

लक्ष्य

जीवन की उलझी डोरी हो,
रेखा भविष्य की कोरी हो
डगमग विश्वास लगे मन का ,
इच्छाओं का विलसित तन हो
                      तब मात पिता की आशा को
                      अविचल गति से फलते जाना
                           बाधाएं आएं आने दो  ,
                         कर एक लक्ष्य चलते जाना

मित्र

जीवन की परिभाषा निश्छल
मित्रभाव में अतिशय कोमल
विपत्तियों में मेरे संबल
जन्मदिवस सुखमय हो उज्जवल
                सुख दुःख की बगिया के पाती
                तुम युग युग के सच्चे साथी
                सभी भाव को बड़े चाव से
                मंथन करते झिझक न आती
इन यादों का आज पिटारा रच जाएगा यारों का कल
            जन्मदिवस सुखमय हो उज्जवल❤️

समाधान

किन आखों से रोएं इनका मोल कौन करेगा
खुदगर्ज़ी के हाथों,तिरस्कार के हृदयों से गुहार लगाऊं?
स्वार्थपरक लोगों से जाकर आशा के अंबार लगाऊं?
 जीवन परीक्षक है, निराशों की शुभचिंतक नहीं ,
तो समाधान?
 गुहार ले जाना है विधाता की ओर जाऊं
       झूठ से लड़ जाऊं कपट को नाच नचाऊं
 हरि बिन "वीरेश" को अनमोल कौन करेगा
       किन आखों से रोएं इनका मोल कौन करेगा 

शिकायत

आजकल दुनिया की मैं बेरूख़ी से रूठा हूं

मुझमें कुछ टूट गया इसलिए मै टूटा हूं

अपनी पाकीज़गी को पेश तो मैं कर ना सका

पूरी दुनिया में सच हूं फिर भी उसका झूठा हूं


           दूर हूं तुमसे करीब आस किए जाता हूं

           मैं तेरी सोच को लिबास दिए जाता हूं

           करके शिरक़त पुकार लेना नजरबंदो को

           तेरे पास ही हूं मैं  विश्वास से बतलाता हूं

ज़िन्दगी की दौड़ में

ज़िन्दगी की दौड़ में निराश नहीं होइए
ख़ुद हाशिए बनाइए न हिम्मत को खोइए
ये ज़िन्दगी गर है तो गम ओ खुशी की लहर भी
न खाली मगज़ सोइए न खुराफात बोइए