Monday, May 27, 2019

कलाम को सलाम

हे धरतीपुत्र कलाम,है तुझको मेरा सलाम
जबतक चलती थी सांस कभी न तूने लिया विराम
है तुझको मेरा सलाम

    विछिन्न हुए हृदयों में तुम स्फूर्ति मार्ग जगाते थे
    गिरकर उठना उठकर चलना बस ये ही तो सिखलाते थे
    विज्ञान विभूति बन जाने का था तेरा पैग़ाम
    है तुझको मेरा सलाम......
 
    थे सम्मानी परहितकारी भारत के लिए समर्पित थे
    जितने भी आविष्कार किए सब भारत को ही अर्पित थे
    थी यही आस कि युवा करें स्वर्णिम अपना भी नाम
    है तुझको मेरा सलाम........

    कर्तव्यनिष्ठता की परिपाटी तुमने और बढाई थी
    सपनों के भारत को लाने में तुमने जान लगाई थी
    विद्वानों की संगति में ही बीती सुबह और शाम
हे धरतीपुत्र कलाम, है तुझको मेरा सलाम
         है तुझको मेरा सलाम।

स्कूल बनाने को

कांटों को फूल बनाने को,प्रतिभा अनुकूल बनाने को
अव्यस्त अनियमित परिवेशों को जड़ सा मूल बनाने को
सौंधी सी मिट्टी को अपने माथे की धूल बनाने को
निकला हूं नवनिर्मित संस्कारों का स्कूल बनाने को

   व्यवहारपरकता और शिक्षा से इनका टूटा नाता है
   ज्यों कुम्हार कच्ची मिट्टी से सुंदर घड़े पकाता है
   शिक्षक वैसे संस्कार से बच्चे बड़े बनाता है
   अज्ञान अशिक्षा और गरीबी को बस भूल बनाने को
   निकला हूं नवनिर्मित ......................................

   द्वेष ईर्ष्या अभद्रता के बच्चे सभी विनाशक हों
   संस्कृतियों का सम्मान करें विद्या के बड़े उपासक हों
   पाश्चात्य सभ्यताओं के ऊपर भारतवासी शासक हों
   भयभीत नौनिहालों को अब नित नव शार्दूल बनाने को
    निकला हूं नवनिर्मित......................................

    जाति पंथ और भेदभाव का विष न इन्हें छूने पाए
    अल्लाह ईशु और रामचंद्र न आपस में लड़ने पाएं
    राष्ट्रधर्म देशानुराग का पाठ सभी पढ़ने आएं
    सब पंथों का आदर हो और झगड़े निर्मूल बनाने को
    निकला हूं नवनिर्मित संस्कारों का स्कूल बनाने को।

Thursday, May 9, 2019

भगिनी तुम प्राणों से प्यारी

भगिनी तुम प्राणों से प्यारी
हिय की व्यथा न कह पाता हूं
सूने घर में रह जाता हूं
कलम डोलती उद्वेलन की
मधुर क्षणों को जब लाता हूं
तिमिर कणों को रोशन करती,माता की अनुपूरक बनती
नेह,समर्पण परिचर्चा से हर्षित होती कुटिया न्यारी
                                 भगिनी तुम प्राणों से प्यारी
               बात सुनाते संग संग खाते
               भोजनगृह में संग संग गाते
               गीतों का विश्लेषण करते
               अपनी जगबीती बतलाते
                दिन ज्यादा थे और बातें कम
                 कौन सुने अब व्यथा हमारी
  भगिनी तुम प्राणों से प्यारी