Wednesday, July 24, 2019

नमन " आजाद "

पुण्य धरा का तृण तृण अपने स्वेद रुधिर से सींचा जिसने
अंग्रेजों की विघटनकारी खाल अस्थि से खींचा जिसने
अनुनय विनय छोड़कर पौरुष से जगती आबाद किया
वीर सपूतों की सूची में नाम अमर ' आजाद ' किया

आस

तुम मिले तो क्या मिले मिले नहीं जो तब तलक
छोड़ जब चले पलट थी धार संग बही पलक
आंख देखी आस थी कि लड़ पड़ेगी आंख से
आंख जब नहीं लड़ी तो देखने लगी फ़लक

स्वागत मेघ

दिशाओं की गर्जना और प्रकृति की मेघ रूपी सर्जना ..
ताल से ताल मिला लो ,शुष्क को ताल बना दो
सावन का बहाना भी है अपनी उत्कंठाओं को हिलोरो, और अपने शारीरिक सौष्ठव को पिपासु और मनमोहकता के मतवालों की मुस्कान के लिए बरसने पर लुटा दो।
अभिवादन है तुम्हारा हरियाली की आकांक्षाओं की ओर से....