१-अश्क पन्नों पे बिखर के यूं टूट जाया करते हैं
जब भी उम्मीद करूं, अपने तब पराया करते हैं
ख़ास ईजात किए हैं सभी ने अपने कुछ नियम
मनाने के एवज में ख़ुद ही रूठ जाया करते हैं
२-सियासत के नए पौधे उगे हैं आज फिर समझे
विनय अनुनय के झूठे चोंचले हैं आज फिर समझे
हैं समझे हम उन्हें भी जो अभी हमको नहीं समझे
समझदारी में क्या रखा हमेशा हम ही क्यों समझें
३-यूं बदलते हैं मंज़र , लगा ही नहीं
साथ मिलते है खंज़र , लगा ही नहीं
शुक्र है रब का कि , मैं अकेला ही हूं
ग़र न दे जो दगा , वो सगा ही नहीं
जब भी उम्मीद करूं, अपने तब पराया करते हैं
ख़ास ईजात किए हैं सभी ने अपने कुछ नियम
मनाने के एवज में ख़ुद ही रूठ जाया करते हैं
२-सियासत के नए पौधे उगे हैं आज फिर समझे
विनय अनुनय के झूठे चोंचले हैं आज फिर समझे
हैं समझे हम उन्हें भी जो अभी हमको नहीं समझे
समझदारी में क्या रखा हमेशा हम ही क्यों समझें
३-यूं बदलते हैं मंज़र , लगा ही नहीं
साथ मिलते है खंज़र , लगा ही नहीं
शुक्र है रब का कि , मैं अकेला ही हूं
ग़र न दे जो दगा , वो सगा ही नहीं
४-जो थे विश्वास,गिरकर चले ही गए
व्यर्थ दोषों के उबटन मले ही गए
छल न पाया कोई जिनको इतिहास में
वे भी अपनों के द्वारा छले ही गए
५-खुद सज्जन बनने के खातिर औरों को दुर्जन कह डाला
ऐसा भी क्या कपट हितैषी को झट से बैरन कह डाला
मैंने उन्नति राह दिखाई थी तुमको, मैं अपराधी हूं
तुमने निःस्वारथ को मेरी, मेरा ही मतलब कह डाला
६-छोटा भी ओहदा हो,पाकर लोग बदल जाते देखा है
अभिमानी कड़ियों में कसकर सोंच बदल जाते देखा है
कुछ व्यावहारिक परिवर्तन और कोमलता से कटुता का पथ
अपनों की बातें सहने का भाव बदल जाते देखा है
७-रचता जो इतिहास हारकर वो बैठा है
अपना ही विश्वास हारकर वो बैठा है
अपने कृत्यों में अव्वल है पर किस्मत की
गलती से सरकार हारकर वो बैठा है
८-अटल मुख से कहा था जो अटल ने वो अटल निकला
न था जनसंघ कल तक संग,संग संग आज चल निकला
जो मन की टीस निकली थी कवि की द्रवित वाणी से
पुरा पाषाण सा वो तीन सौ सत्तर पिघल निकला
९-रीति बंधों ने रक्त संबंधों को तोड़ दिया
रंगीं एक शाम ने निज बचपनों को छोड़ दिया
एक उसके लिए बेटी घरौंदे छोड़ गई
और वो था कि उसके परिजनों को छोड़ दिया
१०-कभी मैं आशियाने तार तार देखता हूं
अहल-ए- दिल पे कटार मार मार देखता हूं
नहीं परवाह मुझे होगा कैसा मुस्तक़बिल
भरी महफिल में तुझे बार बार देखता हूं